सीता डारो न तुम जयमाल
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कमल नयन सूर्य किरणें बिछीं -२
वहां सागर सी है गहराई
कहाँ री खोयी पड़ी ....
सीता डारो न तुम जयमाल
सखी री कहाँ खोयी पड़ी ......
तिरछी भौंहे मायाजाल जादुई
भाषा पढियों न उम्र गंवाई
कहाँ री खोयी पड़ी .....
मुख मंडल कोटि चंदा समाये
जिसे देखन को दुनिया दिवानी
कहाँ री खोयी पड़ी ......
भाल बाल देखो राजा मुनी या
पार पावें न कोई तपसी ज्ञानी
कहाँ री खोयी पड़ी .....
लाल होंठ अमृत घट दीखें
इनकी बातों में कितनी मिठाई
कहाँ री खोयी पड़ी .........
श्वेत मोती -सखी ये -दांत रिझाएँ
गिरे बिजली न दिल को सम्हाल
कहाँ री खोयी पड़ी ......
जनक दुलारी तू लक्ष्मी भवानी
जरा खुद को भी तो ले पहचान
कहाँ री खोयी पड़ी .....
त्रिभुवन स्वामी ये हर दिल बसते
तेरा इनके भी हिया स्थान
कहाँ री खोयी पड़ी
सीता डारो न तुम जयमाल
सखी री कहाँ खोयी पड़ी
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर५
१.५.२०११
लेखन २६.११.१९९७ ९.४५ मध्याह्न
हजारीबाग झारखण्ड
Dadi Maa sapne naa mujhko sach ki tu taveej bandha de..hansti rah tu Dadi Amma aanchal sir par mere daale ..join hands to improve quality n gd work
