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Sunday, May 1, 2011

सीता डारो न तुम जयमाल


सीता डारो न तुम जयमाल
सखी री कहाँ खोयी पड़ी ...






(photo with thanks from other source)


कमल नयन सूर्य किरणें बिछीं -२
वहां सागर सी है गहराई
कहाँ री खोयी पड़ी ....

सीता डारो न तुम जयमाल
सखी री कहाँ खोयी पड़ी ......

तिरछी भौंहे मायाजाल जादुई
भाषा पढियों न उम्र गंवाई
कहाँ री खोयी पड़ी .....

मुख मंडल कोटि चंदा समाये
जिसे देखन को दुनिया दिवानी
कहाँ री खोयी पड़ी ......

भाल बाल देखो राजा मुनी या 
पार पावें न कोई तपसी ज्ञानी
कहाँ री खोयी पड़ी .....

लाल होंठ अमृत घट  दीखें
इनकी बातों में कितनी मिठाई
कहाँ री खोयी पड़ी .........

श्वेत मोती -सखी ये -दांत रिझाएँ
गिरे बिजली न दिल को सम्हाल
कहाँ री खोयी पड़ी ......

जनक दुलारी तू लक्ष्मी भवानी
जरा खुद को भी तो ले पहचान
कहाँ री खोयी पड़ी .....

त्रिभुवन स्वामी ये हर दिल बसते
तेरा इनके भी हिया स्थान
कहाँ री खोयी पड़ी
सीता डारो न तुम जयमाल
सखी री कहाँ खोयी पड़ी


सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर५
१.५.२०११
लेखन २६.११.१९९७ ९.४५ मध्याह्न
हजारीबाग झारखण्ड 



Dadi Maa sapne naa mujhko sach ki tu taveej bandha de..hansti rah tu Dadi Amma aanchal sir par mere daale ..join hands to improve quality n gd work

11 comments:

सुशील बाकलीवाल said...

सीता डारो न तुम जयमाल
सखी री कहाँ खोयी पड़ी

प्रसन्नतापूर्व की उधेडबुन है ये.

टोपी पहनाने की कला...

गर भला किसी का कर ना सको तो...

Surendrashukla" Bhramar" said...

आदरणीय सुशील बाकलीवाल जी नमस्कार हाँ ये सच कहा आप ने प्रसन्नता पूर्व की उधेड़बुन ही समझिये इसे सखियों के समझाने पर माँ सीता का अपना कद भी याद आया और तब कार्य पूर्ण हुआ और उलझाने दूर हो गयीं

धन्यवाद

हरकीरत ' हीर' said...

सीता डारो न तुम जयमाल
सखी री कहाँ खोयी पड़ी ...

सुंदर प्रणय गीत .....!!

Surendrashukla" Bhramar" said...

आदरणीय हरकीरत हीर जी प्रभु श्री राम और माँ सीता के प्रणय गीत-स्वयंवर की छटा ने आप के मन को मोहा सुन हर्ष हुआ ये है भी मनोरम
धन्यवाद

रश्मि प्रभा... said...

swatah hi gungunane lagu hun ... seeta daaro n tum jaymaal... bahut hi badhiyaa ... aap ise vatvriksh ke liye bhejen rasprabha@gmail.com per parichay tasweer blog link ke saath

Surendrashukla" Bhramar" said...

रश्मि जी मै आभारी हूँ आप का रचना आप को प्यारी लगी हम भी प्रभु राम और माँ सीता के प्रणय के इस गीत को यूं ही गुनगुनाते हैं बहुत मजा आता है -इससे आप के गीत के प्रति लगाव का पता चलता है
हम रस प्रभा में इसे अवश्य भेजेंगे
धन्यवाद आप का

Babli said...

बहुत बढ़िया लगा! सुन्दर और प्यारी गीत! मन प्रसन्न हो गया! आपका सभी ब्लॉग एक से बढ़कर एक है!

Surendrashukla" Bhramar" said...

बबली जी बहुत बहुत शुक्रिया आप का भी तहे दिल से
आप हमारे सब ब्लॉग पर आयीं हम आप के आभारी हैं
हिंदी में आप इतना पारंगत कैसे हो गयी है बंगला के साथ - सुन्दर हिंदी आप की और रूचि साहित्य में देख बड़ी खुशी हुयी
शुक्ल भ्रमर ५

Amrita Tanmay said...

गहन है प्रभु राम और माँ सीता के प्रणय .बढ़िया लगा..बहुत सुन्दर भावमयी प्रस्तुति..

Surendrashukla" Bhramar" said...

अमृता तन्मय जी धन्यवाद माँ सीता और प्रभु राम का प्रणय गान आप को भाया सुन हर्ष हुआ
प्रोत्साहन के लिए शुक्रिया
हम आप के सुझाव विचार व् समर्थन की उम्मीद भी लगाये हैं
शुक्ल भ्रमर ५

Sita Paliwal said...

sita maiya kadame choti hai shri ram ko mala kese pahnaye hmare hinduo me aese rsm hai ki pahli baar hi pati, patti ke samne jhukjate hai to sari umr jhukna padta hai bhgwan shri ram bhi nar lila kar rhae hai wo jhukte nhi or maiya mala pahnaye kese lakshman ji ne dekha ki maiya mala pahna nahi pa rhi hai ,tab lakshmanji shri ram ji ke charn chune lage,lakshman ji ko charn chhute dekh bhgwan shri ram lakmanji ko uthane jese hi jhuke sita maiya ne mala pahnadi ,or jagt janani v narayn ,sita ram ek hue jai jai shri ram