RAS RANG BHRAMR KA WELCOMES YOU

Thursday, October 10, 2013

खुश्बू फ़िज़ा मे बिखरी

खुश्बू फ़िज़ा मे बिखरी 
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                                     (photo with thanks from google/net)
चेहरा तुम्हारा पढ़ लूँ
पल भर तो ठहर जाना 
नैनों की भाषा क्या है 
कुछ गुनगुना सुना-ना 
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आईना जरा मै  देखूँ 
क्या मेरी छवि बसी है 
इतना कठोर बोलने को 
कसमसा रही है …….
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आँखों मे आँखें डाले 
मै मूर्ति बन गया हूँ
पारस पारस सी हे री !
तू जान डाल जा ना
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खिलता गुलाब तू है 
कांटे भी तेरे संग हैं 
बिन खौफ मै ‘भ्रमर’ हूँ 
खिदमते-इश्क़ पेश आ ना 
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खुश्बू फ़िज़ा मे बिखरी 
मदमस्त है पवन भी 
अल्हड नदी यूँ दामन- 
को छेड़ती तो न जा 
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अम्बर कसीदाकारी 
अद्भुत नये रंगों से 
बदली है खोले घूँघट
कुछ शेर गुनगुनाना 
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सपने सुहाने दे के 
बिन रंगे चित्र ना जा 
ले जादुई नजर री !
परियों सी उड़ के ना जा 
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"मौलिक व अप्रकाशित" 
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल 'भ्रमर'५
प्रतापगढ़
वर्तमान -कुल्लू हि . प्र.
09.10.2013
10.15-11.00 P.M.



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Sunday, September 30, 2012

उँगलियों के इशारे नचाने लगी


उँगलियों के इशारे नचाने  लगी
उम्र की सीढ़ियों कुछ कदम ही बढे
अंग -प्रत्यंग शीशे झलकने लगे
वो खुमारी चढ़ी  मद भरे जाम से
नैन प्याले तो छल-छल छलकने लगे
लालिमा जो चढ़ी गाल टेसू हुए
भाव भौंहों से पल-पल थिरकने  लगे
जुल्फ नागिन से फुंफकारती सी दिखे
होश-मदहोशी में थे बदलने लगे
नींद आँखों से गायब रही रात भर
करवटें रात भर सब बदलते रहे
तिरछी नैनों की जालिम अदा ऐ सनम
बन सपन अब गगन में उड़ाती फिरे
पर कटे उस पखेरू से हैं कुछ पड़े
गोद में आ गिरें सब तडफने  लगे
सुर्ख होंठों ने तेरे गजब ढा दिया
प्यास जन्मों की अधरों पे आने लगी
दिल धडकने लगा मन मचलने  लगा
रोम पुलकित तो शोले दहकने लगे
पाँव इत-उत चले खुद बहकने लगे
कोई चुम्बक लगे खींचता हर कदम
पास तेरे 'भ्रमर' मंडराने लगे
देख सोलह कलाएं गदराया जिसम
नैन दर्पण सभी खुद लजाने लगे
मंद मुस्कान तेरी कहर ढा रही
कभी अमृत कभी विष परसने लगी
भाव की भंगिमा में घिरी मोहिनी
मोह-माया के जंजाल फंसने लगी
तडफडाती  रही फडफडाती  रही
दर्द के जाल में वो फंसी इस कदर
वेदना अरु विरह के मंझधार में
नाव बोझिल भंवर डगमगाने लगी
नीर ही नीर चहुँ ओर डूबती वो कभी
आस मन में रखे - उतराने लगी
जितना खोयी थी- पायी- भरी सांस फिर
उड़ के तितली सी- सब को सताने लगी
मोरनी सी थिरकती बढ़ी जा रही
उँगलियों के इशारे नचाने लगी
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सुरेन्द्र कुमार शुक्ल 'भ्रमर'
मुरादाबाद-सहारनपुर उ प्र.
१०-१०.४५ मध्याह्न
१०.०३.१२



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Friday, August 10, 2012

कान्हा कृष्णा मुरली मनोहर आओ प्यारे आओ




जन्माष्टमी की हार्दिक शुभ कामनाये आप सपरिवार और सारी प्यारी मित्र मण्डली को भी आप के भ्रमर की तरफ से जय श्री कृष्णा ….

भ्रमर ५
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कान्हा कृष्णा मुरली मनोहर आओ प्यारे आओ
व्रत ले शुभ सब -नैना तरसें और नहीं तरसाओ
जाल –जंजाल- काल सब काटे बन्दी गृह में आओ
मातु देवकी पिता श्री को प्रकटे तुम हरषाओ
भादों मास महीना मेघा तड़ित गरज मतवारे
तरु प्राणी ये प्रकृति झूमती भरे सभी नद नाले
कान्हा कृष्णा मुरली मनोहर आओ प्यारे आओ
व्रत ले शुभ सब – नैना तरसें और नहीं तरसाओ
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बारह बजने से पहले ही –सब- बंदी गृह में सोये
प्रकट हुए प्रभु नैना छलके माता गदगद होये
एक लाल की खातिर दुनिया आजीवन बस रोये
जगत के स्वामी कोख जो आये सुख वो वरनि न जाये
दैव रूप योगी जोगी सब नटखट रूप दिखाये
बाल रूप माता ने चाहा गोद में आ फिर रोये
सूप में लाल लिए यमुना जल सागर कैसे जाएँ
हहर -हहर कर उफन के यमुना चरण छुएं घट जाएँ
सब के हिय सन्देश गया सब भक्त ख़ुशी से उछले
आरति वंदन भजन कीर्तन थाली सभी बजाये
आज मथुरा में हाँ आज गोकुला में छाई खुशियाली
श्याम जू पैदा भये …………….


images (1)













मथुरा से गोकुल पावन में प्रभु प्रकटे खुशहाली

ढोल मजीरा छम्मक -छम्मक घर घर बजती थाली
बाल -ग्वाल गोपिन गृह – गृहिणी -गौएँ -सब हरषाये
मोर-पपीहा-दादुर-मेढक-अपनी धुन में-लख चौरासी गाये
बाल -खिलावन को मन उमड़े सब यशोदा गृह आये
नैन मिला रस -प्रीति पिलाये श्याम सखा दिल छाये
अब लीला प्रभु क्या मै वरनूं ‘क्षुद्र’ भगत हम तेरे
ठुमुक ठुमुक चल पैजनी पहने कजरा माथे लाओ
तुम सोलह सब कला दिखाओ कंस मार सब तारो
माखन खाओ नाग को नाथो गौअन आइ चराओ
प्रेम -ग्रन्थ राधा -कृष्णा के पढ़ा -पढ़ा दिल में बस जाओ
हरे कृष्णा-कृष्णा कृष्णा -कृष्णा कृष्णा हरे हरे !
नैन बंद कर हो चैतन्या जग तुममे खो जाये ……

सुरेन्द्र कुमार शुक्ल ‘भ्रमर’ ५
कुल्लू यच पी
७-७.५५ पूर्वाह्न
१०-.०८.२०१२

दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं





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Thursday, July 5, 2012

मृगनयनी कैसी तू नारी ?? ------------------------------





मृगनयनी कैसी तू नारी ??
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मृगनयनी कजरारे नैना मोरनी जैसी चाल
पुन्केशर   से जुल्फ तुम्हारे तू पराग की खान
तितली सी इतराती फिरती सब को नाच नचाती
तू पतंग सी उड़े आसमाँ लहर लहर बल खाती
कभी पास में कभी दूर हो मन को है तरसाती
इसे जिताती  उसे हराती जिन्हें 'काट' ना आती
कभी उलझ जाती हो दो से महिमा तेरी न्यारी
पल छिन  हंसती लहराती औंधे-मुंह गिर जाती
कटी पड़ी भी जंग कराती - दांव लगाती
'समरथ' के हाथों में पड़ के लुटती हंसती जाती
तो जीती तो भी जीती - हारे 'हार' है पाती
कभी सरल है कभी कठिन तू अजब पहेली 'भाती'
कोमल गात कभी किसलय सी छुई -मुई है लगती
कभी शेरनी कभी सर्पिणी कभी दामिनी लगती
गोरी कलाई हरी चूड़ियाँ इंद्र-धनुष सी दिखती
रौद्र रूप धारण करती तो बनी कालिका  फिरती
ज्योति पुंज है तू लक्ष्मी है सब के दिल की जान है तू
कभी मेनका कभी अप्सरा ऋषि मुनि का अभिशाप है तू
तो वीणा है सुर-लहरी तू मन का रस आलाप है तू
तू माया है बड़ी मोहिनी एक भंवर जंजाल है तू
तू नैया है कभी खिवैया पार करे पतवार है तू
तू उलझन है कर्कश लहरें प्रलय बड़ी तूफ़ान है तू
तू गुलाब है बेला जूही रात की रानी कली चमेली
नागफनी है काँटा है तू बेल है तू विष-कन्या सी
पावन है तू गीता है तू सीता सावित्री गंगा धारा
काम-सूत्र है तू मदांध है बड़ी स्वार्थी विष की धारा
मधुर चांदनी मधु-मास है तू वसंत है प्रेम की खान
कृष्ण पक्ष है बड़ी  मंथरा  बनी पूतना होती 'काल'
तू चरित्र है या कलंक है प्रेम विरह में 'भ्रमर' घूमते  चक्कर खाते
अगणित अद्भुत रूप तुम्हारे जान बूझ भी 'पर' कटवाते
अमृत-कुण्ड नहा लेते कुछ मैली-सरिता -'सभी' डुबाते
कीट-पतंगों सा जल-जल भी मरते दम तक कुछ मंडराते
ये प्रेम बड़ी है अद्भुत माया जो पाया वो सभी लुटाया
नींद गंवाता चैन गंवाता सब कुछ हारे सब कुछ पाता
इस जीवन सी गजब पहेली संग संग विचरे बनी सहेली
आओ जी भर प्यार करें हम डूब के पा लें सारे मोती
बड़ी सुनहरी सपना है तू सीपी है तू सात जनम की साथी
चकाचौंध है तू मेला है पल छिन की बाराती
सुन्दर कानन कल्प वृक्ष तू जीवन दाई हरियाली
तू उचाट है वंजर है तू कभी उगा- खा जाती
प्रेम ग्रन्थ आओ पढ़ पढ़ के कुछ गुत्थी सुलझाएं
मरें  मिटें दीवाने चाहे प्रेम 'अमर' हो जाए
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सुरेन्द्र कुमार शुक्ल 'भ्रमर'
१.३०-२.२० मध्याह्न
फतेहपुर - कुल्लू हिमाचल   रास्ते में वाहन में
२८.०२.२०१२



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Wednesday, May 23, 2012

मेह सावन की ‘बदली’ नहाने लगी


मेह सावन की ‘बदली’ नहाने लगी
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रूप पल -पल बदलती रही रात भर
चांदनी जिसमे से छल-छ्लाने लगी
वो छन-छन छनक आ मिली नैन से
मुझको चातक चकोरा बनाने लगी
रूपसी -प्रेयसी झिलमिलाती दिखी
जुल्फ झर- झर वहीं झहराने लगी
लाल सूरज की बिंदिया को छोड़े कभी
पूर्णिमा चाँद माथे सजाने लगी
जाने कितने सितारे नगीने जड़े
वो बदल साड़ियाँ झिलमिलाने लगी
गोरी भूरी व् काली सुनहरी कभी
टूट बिखरी कभी मन सताने लगी
पंखुड़ी फिर मिली वो कली सी बनी
फूटती फिर कली मुस्कुराने लगी
एक दूल्हा सजा था गुमसुम खड़ा
ताकती भौंहे पलकें झुकाने लगी
मोहिनी कामिनी मोरनी सी चली
घुंघरुओं की खनक-खनखनाने लगी
सरसराती हवा सिरफिरी सी चली
दामिनी -संग गरज- लपलपाने लगी
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(सभी फोटो गूगल/नेट से साभार लिया गया )






एक कर्कश गरज -दाब के मोड़ पे
वो भी हारी सिकुड़ती दिखी शीत में
बूँद रिम-झिम बरस कर जुड़ाने लगी
तृप्त जलते हुए उर को करती बढ़ी
मेह सावन की ‘बदली’ नहाने लगी
खो के अस्तित्व प्यारा सा अपना सभी
क्षीर सागर में लगता वो सोने गयी !
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सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर ५
जालंधर पंजाब
१.४०-२.३० मध्याह्न
११.०३.2012



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Thursday, May 10, 2012

जैसे गोरी घूँघट में हो



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जैसे गोरी घूँघट में हो
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रंग बिरंगी बदरी डोलीं
घेर गयीं “दिनकर” को
शरमाया सा छुपा जा रहा
आंचल – बदली के वो
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तभी प्रिया ने करवट बदला
छन- छन लाली आयी
सप्त रंग के इंद्र धनुष बन
शरमाना दिखलाई
जैसे गोरी घूँघट में हो
पलक किये कुछ नीचे
चपला सी मुस्कान लहर को
वो अधरों में भींचे
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छुई – मुई सी कोई कली सी
हो बैठी सकुचाई
लेकिन भाटा – ज्वार उठे तन
अंग – अंग सिहरन भर आई
सूर्य रश्मि तब लिए लालिमा
छन – गालों- अधरों -पलकों हो
शर्मीली बन हृदय समाई
द्युति चमकी बस दिखी एक पल
खो तम-गयी-लजाती !
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सुरेन्द्र कुमार शुक्ल “भ्रमर”
८-५-२०१२ कुल्लू यच पी
७.३०-८.१५





दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं







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Tuesday, April 10, 2012

होंठ रसीले


होंठ रसीले लरज रहे हैं 
शायद रस-मधु घोले

चाँद सा मुखड़ा सूर्यमयी   है 
घूँघट कब ये खोले ?
नैन जादुई झील  से गहरे 
जीव जगत सब तरते 
ढाई आखर प्रेम ग्रन्थ में 
गहराई सब डूबे 
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Bhramar5
.१२-.२२ पूर्वाह्न 
..२०१२ कुल्लू यच पी 



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